सवर्णों के भारी गुस्से के आगे झुकी सरकार? UGC के विवादित नियमों पर अब हाई लेवल कमेटी करेगी फैसला!

सवर्णों के भारी गुस्से के आगे झुकी सरकार? UGC के विवादित नियमों पर अब हाई लेवल कमेटी करेगी फैसला!

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विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा जारी किए गए नए नियमों को लेकर देशभर में चल रहे विरोध प्रदर्शनों के बीच एक बड़ी खबर सामने आ रही है। सूत्रों के अनुसार, यूजीसी जल्द ही इस मामले पर एक स्पष्टीकरण जारी करने की तैयारी में है और केंद्र सरकार एक उच्च स्तरीय समिति (High Level Committee) का गठन करने पर विचार कर रही है।

सरकार का उद्देश्य सामान्य वर्ग के छात्रों और संगठनों को यह आश्वासन देना है कि इन नियमों का उनके खिलाफ दुरुपयोग किसी भी हाल में नहीं होने दिया जाएगा। गौरतलब है कि 13 जनवरी 2026 को इन नियमों की अधिसूचना जारी होने और 15 जनवरी 2026 से इसे लागू किए जाने के बाद से ही सामान्य वर्ग द्वारा लगातार विरोध प्रदर्शन किया जा रहा है।

इन नियमों की पृष्ठभूमि काफी संवेदनशील है। जनवरी 2016 में तेलंगाना में रोहित वेमुला और मई 2019 में पायल तड़वी की आत्महत्या के मामलों ने देश को झकझोर दिया था, जिसके बाद पीड़ित परिजनों ने 29 अगस्त 2019 को सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर शिक्षण संस्थानों में जातीय भेदभाव के खिलाफ सख्त नियमों की मांग की थी। इसी याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने जनवरी 2025 में डेटा जुटाने और नए नियम बनाने का निर्देश दिया था, जिसके बाद संसदीय समिति की सिफारिशों के आधार पर इन नियमों को अंतिम रूप दिया गया।

संसदीय समिति ने ड्राफ्ट की समीक्षा करते हुए भेदभाव की परिभाषा स्पष्ट करने और समानता समितियों में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) को शामिल करने की सिफारिश की थी। नए नियमों के तहत जाति, धर्म, नस्ल, लिंग, जन्मस्थान या दिव्यांगता के आधार पर शिक्षा में समानता में बाधा डालने वाले या मानव गरिमा का उल्लंघन करने वाले किसी भी व्यवहार को जातीय भेदभाव माना गया है। अब सुरक्षा के इस दायरे में एससी (SC) और एसटी (ST) के साथ-साथ ओबीसी छात्रों को भी शामिल कर लिया गया है, जो पहले इसमें शामिल नहीं थे। इसके अलावा, कॉलेजों में एक 'समानता समिति' गठित की जाएगी जिसकी अध्यक्षता कॉलेज प्रमुख करेंगे और इसमें एससी, एसटी, ओबीसी, महिला और दिव्यांग सदस्य शामिल होंगे, जिनका कार्यकाल दो साल का होगा।

हालांकि, विवाद की मुख्य वजह नियमों में किए गए कुछ विशिष्ट बदलाव हैं। सामान्य वर्ग की चिंता का सबसे बड़ा कारण झूठी शिकायतों पर सजा के प्रावधान को हटाना है। वर्ष 2025 के ड्राफ्ट में यह स्पष्ट प्रावधान था कि यदि कोई छात्र झूठी या दुर्भावनापूर्ण शिकायत करता है, तो उस पर जुर्माना लगाया जाएगा या उसे सस्पेंड किया जा सकता है। किंतु 13 जनवरी 2026 को लागू किए गए अंतिम नियमों में से झूठी शिकायत पर सजा के इस प्रावधान को हटा दिया गया है। सामान्य वर्ग को डर है कि सजा का प्रावधान न होने के कारण इन नियमों का दुरुपयोग किया जा सकता है, क्योंकि शिकायत झूठी पाए जाने पर भी शिकायतकर्ता पर कोई कार्रवाई नहीं होगी।

विरोध का दूसरा बड़ा कारण भेदभाव की परिभाषा और शिकायत का अधिकार है। नए नियमों के अनुसार, भेदभाव का अर्थ केवल एससी, एसटी और ओबीसी समुदायों के साथ होने वाले दुर्व्यवहार से है, जिसका सीधा मतलब है कि सामान्य वर्ग के छात्र इन विशेष नियमों के तहत अपनी शिकायत दर्ज नहीं करा सकते। सामान्य वर्ग के संगठनों का तर्क है कि यह सवर्ण छात्रों को सुरक्षा के दायरे से बाहर रखता है और यदि उनके साथ भेदभाव होता है, तो उनके पास इस तंत्र के तहत कोई उपाय नहीं है। इन तमाम चिंताओं को देखते हुए सरकार अब नियमों के दुरुपयोग को रोकने का भरोसा दिलाने और संभावित रूप से नियमों पर पुनर्विचार या स्पष्टीकरण के लिए उच्च स्तरीय समिति बनाने की दिशा में आगे बढ़ रही है।