पीसीएस अलंकार अग्निहोत्री का इस्तीफा; प्रशासनिक विद्रोह या ब्राह्मण अस्मिता की नई लड़ाई?
रिपोर्ट-ओम द्विवेदी(बाबा)
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बरेली में सिटी मजिस्ट्रेट के पद पर तैनात पीसीएस अफसर अलंकार अग्निहोत्री ने गणतंत्र दिवस के मौके पर दो ऐसे मुद्दे को सामने रखते हुए इस्तीफा दिया है, जिससे खलबली मची हुई है। इस कदम को तीन प्रमुख चश्मों से देखा जा रहा है।
शंकराचार्य का मामला हो या यूजीसी का रेगुलेशन, दोनों पर देश में पहले चर्चा छिड़ी हुई है। प्रशासनिक कदम का प्रशासन के बीच से ही विरोध से अफसर और सत्ता से जुड़े लोग सकते में हैं। इस्तीफे के बाद अलंकार अग्निहोत्री ने ब्राह्मणों पर अत्याचार बोलकर ऐसे-ऐसे मामले उठाए हैं, जो आने वाले समय में भाजपा की मुश्किलें बढ़ा सकते हैं।
शंकराचार्य मामले पर धार्मिक भावना और 'शिखा' का अपमान
अलंकार अग्निहोत्री के मुताबिक इस्तीफे का सबसे तात्कालिक और भावनात्मक कारण प्रयागराज माघ मेले की घटना है। ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के बटुक शिष्यों के साथ हुई कथित मारपीट और चोटी (शिखा) खींचने की घटना ने उन्हें झकझोर दिया। प्रशासनिक पद पर रहते हुए किसी अधिकारी का यह कहना कि बटुकों की चोटी खींची गई और प्रशासन मूकदर्शक बना रहा, यह दर्शाता है कि नौकरशाही के भीतर 'जातिगत और धार्मिक पहचान' अनुशासन पर भारी पड़ने लगा है। उन्होंने इसे सीधे तौर पर 'ब्राह्मण आत्मसम्मान' पर हमला करार दिया है।
'UGC रेगुलेशन 2026' और सवर्णों की असुरक्षा
अलंकार अग्निहोत्री ने UGC के नए नियमों को 'काला कानून' बताया है। 13 जनवरी 2026 को सामने आए इन नियमों में उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव रोकने के लिए सख्त प्रावधान किए गए हैं। अलंकार का आरोप है कि ये नियम सामान्य वर्ग (General Category) को 'स्वघोषित अपराधी' की तरह देखते हैं और इससे सबसे ज्यादा ब्राह्मणों का उत्पीड़न बढ़ेगा। उनका यह भी कहना कि ब्राह्मण जनप्रतिनिधि अब कॉर्पोरेट कंपनी के कर्मचारी बनकर रह गए हैं, सीधे तौर पर सत्ताधारी दल के भीतर मौजूद ब्राह्मण नेतृत्व की 'बेबसी' की ओर इशारा करता है।
गणतंत्र दिवस पर 'गनतंत्र' का आरोप
76 साल की संवैधानिक यात्रा पर सरकार और भाजपा जहां 'एक भारत-श्रेष्ठ भारत' की बात कर रहे थे, वहीं अलंकार अग्निहोत्री 'गनतंत्र' की बात कर रहे हैं। इस्तीफा देने से पहले सोशल मीडिया पर पोस्टर के साथ फोटो डालना और सीधे सत्ताधारी दल के बहिष्कार की बात करना, सर्विस कंडक्ट रूल्स (Service Conduct Rules) का खुला उल्लंघन भी है।
अलंकार के इस्तीफे से कई सवाल
क्या एक अधिकारी पद पर रहते हुए इतना राजनीतिक हो सकता है? या फिर व्यवस्था के भीतर संवाद की कमी है कि एक अफसर को 'विद्रोह' करना पड़ रहा है? या उनकी खुद की राजनीतिक तैयारी है? अलंकार का इस्तीफा भले ही व्यक्तिगत नाराजगी लगे, लेकिन इससे एक नया नैरेटिव खड़ा होता दिख रहा है। मामला तूल पकड़ता है तो विधानसभा चुनावों से पहले पंडितों की नाराजगी का माहौल बनाया जा सकता है। चूंकि उन्होंने राजनीतिक दलों के खिलाफ पोस्ट की है, इसलिए इस्तीफा स्वीकार होने से पहले उन पर जांच और अनुशासनात्मक कार्रवाई (जैसे सस्पेंशन या बर्खास्तगी) की तलवार भी लटक सकती है।

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