रायबरेली-पोखरणों में उड़ रही धूल , कुएं इतिहास में दफन

रायबरेली-पोखरणों में उड़ रही धूल , कुएं इतिहास में दफन

-:विज्ञापन:-

   रिपोर्ट-सागर तिवारी

ऊंचाहार-रायबरेली - किसी जमाने में जल के स्रोत रहे पोखरण और कुएं अब इतिहास में दफन हो रहे है। ज्यदातर कुएं खत्म हो चुके है तो तालाब की खोदाई में खर्च हुए करोड़ो रूपये व्यर्थ हो रहे है। जिम्मेदारों की लापरवाही के कारण तालाबो में धूल उड़ रही है। जिसके कारण मवेशियों तक को हलक तर करने के लिए एक बूंद पानी तक मयस्सर नहीं हो रहा है ।
      एक जमाना था जब पूरी आबादी कुएं के पानी पर ही जिन्दा रहती थी। समय बदला और कुएं जवाब दे गए। जलस्तर घटा तो कुएं के पानी सुख गए। अब केवल उन्ही गांव के कुओं  में पानी है जहाँ सीपेज के समस्या है। और उन कुओं का पानी पीने योग्य नही है।  विशेष कर शारदा सहायक नहर के आस पास गांव और रोहनिया ब्लाक में बकुलाही झील से प्रभावित गांव में ऐसी स्थित है।
       तालाबों का आलम यह है कि पूरे क्षेत्र में करीब 467 तालाबो की खोदाई मनरेगा के तहत कराई गयी है। इस काम में करोड़ो रुपये खर्च हुए और हर साल तालाबो की मरम्मत के नाम पर भारी रकम खर्च की जा रही है। लेकिन तालाबो के निर्माण का उद्देश्य सरकारी दुर्व्यवस्था के कारण पूरा नही हो पा रहा है। पुरे क्षेत्र के सारे तालाब सूखे पड़े है। तालाबो का आलम यह है कि उनमे पानी के स्थान पर धूल उड़ रही है।  पुरे क्षेत्र में करीब 40 आदर्श तालाब है। और आदर्श तालाबो में भी पानी नही है। गांव गांव भटक रहे बेसहारा मवेशियों को हलक तर करने के लिए कहीं एक बूंद पानी तक नहीं मिल रहा है । 
      इस समय पूरा सरकारी अमला लोकसभा चुनाव के व्यस्त है । गांव में मूलभूत जरूरत पर कोई ध्यान नहीं दे रहा है । नहरें , तालाब सभी सूखे पड़े हैं । खेतों में मौसमी सब्जियों के अलावा पिपरमेंट की फसल है । जो किसी तरह निजी ट्यूबवेलों के सहारे जिंदा है , किंतु बेजुबान जानवर , पक्षियों के लिए कहीं पानी नहीं है । गांव पंचायतों को तालाबों में पानी भरवाने की जिम्मेदारी दी गई हैं, किंतु गांव के जिम्मेदार कर्मचारी और ग्राम प्रधान दोनों बेपरवाह बने हुए है । कोई भी इस समस्या की ओर ध्यान देने की जरूरत महसूस नहीं कर रहा है ।