रायबरेली-ऊंचाहार विशेष: "साहब, क्या मिलावटखोरों से सेटिंग हो गई है?"

रायबरेली-ऊंचाहार विशेष: "साहब, क्या मिलावटखोरों से सेटिंग हो गई है?"

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​ऊंचाहार (रायबरेली): होली का हुड़दंग शुरू होने से पहले ही ऊंचाहार के बाजारों में 'सफेद जहर' का कारोबार अपनी चरम सीमा पर है। ताज्जुब की बात यह है कि खाद्य विभाग की टीम को शायद ऊंचाहार का रास्ता ही नहीं मिल रहा, या फिर बड़े शोरूमों की चमक ने उनकी आंखों पर पट्टी बांध दी है।मछलियों पर जाल मगरमच्छों को 'सलाम'!
​रायबरेली शहर की तरह ऊंचाहार में भी वही पुराना खेल दोहराया जा रहा है। गली-कूचे के छोटे दुकानदारों पर डंडा चलाने वाला प्रशासन उन नामचीन दुकानों की दहलीज पार करने की हिम्मत क्यों नहीं जुटा पा रहा, जहाँ 400 से 800 रुपये प्रति किलो में 'जहरीली मिठास' परोसी जा रही है?
​कड़वा सवाल यह है कि क्या विभाग यह इंतजार कर रहा है कि लोग बीमार होकर अस्पतालों में भर्ती हों, तब जाकर 'सैंपलिंग' का नाटक शुरू किया जाएगा?

​⚠️ ऊंचाहार की जनता पूछती है:

​वीआईपी दुकानें अभेद्य क्यों? आखिर इन रसूखदार दुकानदारों के पास कौन सा 'सुरक्षा कवच' है कि खाद्य निरीक्षक वहां झांकने तक नहीं जाते?
​होली के बाद फोटो क्यों? चर्चा है कि विभाग होली बीतने का इंतजार कर रहा है ताकि दुकानदार अपनी जेबें भर लें और अधिकारी बाद में 'खानापूर्ति' कर सकें।
​सेहत से समझौता: खोये और पनीर के नाम पर जो केमिकल का खेल चल रहा है, उसका जिम्मेदार कौन होगा?
​ऊंचाहार की जनता अब चुप बैठने वाली नहीं है। प्रशासन को यह साफ करना होगा कि उनका 'करम' केवल गरीबों और छोटों पर ही क्यों बरसता है? "मगरमच्छों" पर रहम बंद करो और ऊंचाहार की थाली को मिलावट मुक्त करो!