महिला शिक्षिकाओं का उग्र रोष: लंबित न्याय और फाइलों में दबती उम्मीदें

महिला शिक्षिकाओं का उग्र रोष: लंबित न्याय और फाइलों में दबती उम्मीदें

-:विज्ञापन:-




150 से अधिक शिकायतें, तीन माह बाद भी निस्तारण शून्य: बीईओ कार्यालय की निष्क्रियता पर सवाल


वेतन असमानता और अवशेष देयक लंबित: बछरावां की महिला शिक्षिकाओं की अनवरत लड़ाई


जांच समिति गठित, समय पूर्ण फिर भी कोई कार्यवाही नहीं:विभाग की लचर जांच पर उठे सवाल

रिपोर्ट:- ऋषि मिश्रा
मो०न०:-9935593647


बछरावां रायबरेली। महिला सशक्तिकरण और नारी सम्मान के दावों के बीच बछरावां का बीईओ कार्यालय गंभीर सवालों के घेरे में है। यहाँ महिला शिक्षिकाओं की शिकायतें प्रार्थना पत्रों में दर्ज होकर फाइलों की परतों में दबती जा रही हैं और समाधान अंतहीन प्रतीक्षा में बदलता दिखाई दे रहा है। प्राथमिक विद्यालय कुर्री की प्रधानाध्यापिका नीलम त्रिपाठी की मूल सेवा पुस्तिका के संबंध में पत्रांक प्रा०वि० कुर्री/सेवा पुस्तिका/24/2024-25 दिनांक 11.04.2025 में यह स्वीकार किया गया कि अभिलेख वर्ष 2016 से गुम है। यदि सेवा पुस्तिका वर्षों से उपलब्ध नहीं थी तो वेतनवृद्धि और अन्य लाभ किस आधार पर दिए गए!यह प्रश्न आज भी अनुत्तरित है। इसी क्रम में श्वेता सिंह और विशेष रूप से विद्या सोनकर का प्रकरण महिला शिक्षिकाओं के आक्रोश का केंद्र बन चुका है। विद्या सोनकर की मूल सेवा पुस्तिका के अभाव में उनकी एसीपी तीन वर्षों से लंबित है; बार-बार प्रार्थना पत्र, स्मरण पत्र और व्यक्तिगत उपस्थितियों के बावजूद न तो अभिलेखों की पुनर्स्थापना की ठोस कार्यवाही हुई और न ही वैकल्पिक सत्यापन की प्रक्रिया आगे बढ़ी। प्रश्न यह उठता है कि जब त्रुटि कार्यालय स्तर पर स्वीकार की जा चुकी है, तो उसका दंड एक शिक्षिका को क्यों भुगतना पड़ रहा है? प्राथमिक विद्यालय मुबारकपुर सापों की रेनू सिंह का प्रकरण भी प्रशासनिक विलंब का उदाहरण बन गया है। पत्रांक 14551-53/2018-19 दिनांक 22.12.2018 द्वारा वेतन बाधित हुआ, फरवरी 2019 में बहाल किया गया और पत्रांक 1616-17/2020-21 दिनांक 21.07.2020 से चयन वेतनमान स्वीकृत हुआ, फिर भी औपचारिक आदेश आज तक निर्गत नहीं हुआ। आदेश कागज़ों में है, पर अधिकार धरातल पर नहीं। चयन वेतनमान को लेकर असमानता के आरोप भी गंभीर हैं। प्राथमिक विद्यालय टांडा की अर्चना सिंह और प्राथमिक विद्यालय बबुरिहा खेड़ा की कमलेश यादव ने शिकायत की है कि समान बैच के एक शिक्षक को वर्षों से लाभ दिया जा रहा है, जबकि उन्हें वंचित रखा गया। जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी के दिनांक 30.08.2024 में आवश्यक कार्रवाई के निर्देश के बावजूद स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ। कंपोजिट विद्यालय नीमटीकर की प्रधानाध्यापिका कल्पना लगातार अपने विद्यालय में अनुचर (सहायक शिक्षक) की नियुक्ति की माँग कर रही हैं। उनके विद्यालय में छात्र संख्या अधिक है, जबकि पास के कंपोजिट विद्यालय चुरुवा में दो अनुचर कार्यरत हैं। कई बार लिखित प्रार्थना पत्र देने के बावजूद प्रशासनिक तंत्र की प्रतिक्रिया मौन रही। इस अभाव ने विद्यालय के पाठ्यक्रम संचालन और कक्षाओं की गुणवत्ता पर प्रतिकूल प्रभाव डाला है। यह प्रकरण केवल पद की रिक्ति का नहीं, बल्कि समानता और न्यायसंगत संसाधन वितरण की परीक्षा बन गया है।अवशेष देयकों को लेकर आक्रोश और व्यापक है।प्राथमिक विद्यालय पलिया की सरिता सिंह, कन्या उच्च प्राथमिक विद्यालय राजामऊ की विभा सिंह, प्राथमिक विद्यालय देवइया की लक्ष्मी जयसवाल, कंपोजिट विद्यालय खैरहनी की विनीता उपाध्याय, कंपोजिट विद्यालय चुरूवा की समता सिंह, कंपोजिट विद्यालय चुरुवा की रेखा मिश्रा, कन्या उच्च प्राथमिक विद्यालय मिही खेड़ा की अर्चना मिश्रा, प्राथमिक विद्यालय सूरजपुर की प्रधानाध्यापिका ज्योति चौरसिया, कंपोजिट विद्यालय नीमटीकर की पूनम, कंपोजिट विद्यालय पहनासा की नीतू चौधरी एवं नेहा मिश्रा, प्राथमिक विद्यालय बिशुनपुर की मीनू जायसवाल तथा भुवन मोहनी सहित अनेक शिक्षिकाओं ने देयक न मिलने की शिकायत दर्ज कराई है। इसके अतिरिक्त शिकायतकर्ताओं में नीतू सिंह, तनुजा नगर कोटी, रश्मि चौधरी, सुमन सिंह, शालिनी सिंह, रचना शुक्ला, पुष्पा यादव, निशा सैनी, मोनिका यादव, नीलू सिंह, संगीता देवी, अर्चना वर्मा, रेखा शिखा, कल्पना वर्मा, चारु सेठ, सुमन लता, अंजली देवी, आराधना श्रीवास्तव, अस्मिता, प्राची सिंह, नीता, मोनी, आराधना, भावना श्रीवास्तव, कंचन लता, प्रियंका पांडे, चित्रलेखा, पिंकी गुप्ता,स्नेह लता, सुषमा सिंह, अलका,  सिंह, वंदना वर्मा, नीता गुप्ता, दुर्गेश कुमारी, शैल कुमारी, मंजू द्विवेदी और आरती भी शामिल हैं, जिन्होंने विभिन्न प्रशासनिक एवं वित्तीय समस्याओं को लेकर प्रार्थना पत्र दिए थे। दिनांक 18.11.2025 को बीआरसी बछरावां में आयोजित शिक्षक समाधान दिवस में 150 से अधिक शिकायतें दर्ज हुईं, जिनमें बड़ी संख्या महिला शिक्षिकाओं की थी, किंतु तीन माह से अधिक समय बीत जाने पर भी निस्तारण न होना इस पहल को औपचारिकता में बदलता दिखाता है। तत्पश्चात जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी, रायबरेली कार्यालय द्वारा पत्रांक 13163-64/2025-26 दिनांक 20.01.2026 से जांच समिति गठित की गई और एक माह में रिपोर्ट देने का निर्देश हुआ, पर निर्धारित समय बीत जाने के बाद भी जांच प्रारंभ न होना कई प्रश्न खड़े करता है। समस्त घटनाक्रम यह स्पष्ट करता है कि यह केवल व्यक्तिगत शिकायतों का विषय नहीं, बल्कि प्रशासनिक पारदर्शिता, जवाबदेही और संवेदनशीलता की परीक्षा है। जब एक शिक्षिका की सेवा पुस्तिका गुम होने का दंश उसे वर्षों तक एसीपी से वंचित रखे, जब चयन वेतनमान में भेदभाव दिखे, अवशेष देयक लंबित रहें, और अनुचर की नियुक्ति जैसी मूलभूत व्यवस्थाएँ टलती रहें, तब आक्रोश स्वाभाविक है। अब प्रश्न यही है कि क्या जांच और आदेश वास्तविक न्याय में परिणत होंगे, या महिला शिक्षिकाओं की यह सामूहिक पुकार भी फाइलों की धूल में दबकर रह जाएगी।