रायबरेली-सेवापुस्तिका से अवशेष वेतन तक: बछरावां में जीरो टॉलरेंस का ढीला तंत्र

रायबरेली-सेवापुस्तिका से अवशेष वेतन तक: बछरावां में जीरो टॉलरेंस का ढीला तंत्र

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रिपोर्ट:- ऋषि मिश्रा
मो०न०:-9935593647


बछरावां रायबरेली। प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा लागू की गई "जीरो टॉलरेंस" नीति, जो भ्रष्टाचार और प्रशासनिक मनमानी के खिलाफ कड़ा संदेश देने के उद्देश्य से लाई गई थी, अब बछरावां विकासक्षेत्र में अपनी जमीनी प्रभावशीलता को लेकर गंभीर सवालों के घेरे में है। शासन बार-बार यह दावा करता रहा कि किसी भी स्तर पर भ्रष्टाचार बर्दाश्त नहीं किया जाएगा, लेकिन बछरावां के शिक्षक और कर्मचारी वर्षों से अपने मूल अधिकारों, चयन वेतनमान और लंबित वेतन के लिए संघर्षरत हैं और प्रशासनिक उदासीनता तथा भ्रष्टाचार के चलते न्याय नहीं पा रहे। 18 नवंबर 2025 को ब्लॉक संसाधन केंद्र बछरावां में आयोजित शिक्षक समाधान दिवस में 150 से अधिक शिकायतें दर्ज की गईं। शिक्षक- शिक्षिकाओं ने बड़ी उम्मीद के साथ अपनी समस्याओं का समाधान मांगा और कार्यक्रम की भूरी-भूरी प्रशंसा की। लेकिन तीन महीने बीत जाने के बाद भी कोई ठोस कार्यवाही नहीं हुई। जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी रायबरेली राहुल सिंह की अध्यक्षता में हुए इस कार्यक्रम में मिली शिकायतों के निस्तारण में विफलता ने समाधान दिवस की विश्वसनीयता पर ही सवाल खड़ा कर दिया। इस मामले में राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ ने भी ज्ञापन प्रस्तुत किया था, जिसमें शिक्षकों की समस्याओं के शीघ्र निवारण और आक्रोश को शांत करने की मांग की गई थी। इन शिकायतों और ज्ञापन के आधार पर जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी कार्यालय ने पत्रांक 13163-64/2025-26, दिनांक 20-01-2026 के माध्यम से विकास क्षेत्र बछरावां के बीईओ कार्यालय में व्याप्त मनमानी और भ्रष्टाचार की जांच के लिए समिति गठित की। इस समिति में नगर शिक्षा अधिकारी और बीईओ शिवगढ़ शामिल थे, और उन्हें एक माह में जांच पूरी करने का निर्देश दिया गया। लेकिन अब तक, 26 दिन बीत जाने के बावजूद, जांच कार्य शुरू नहीं हुआ। यह विलंब सवाल खड़ा करता है कि क्या जांच जानबूझकर टाली जा रही है ताकि भ्रष्टाचार में लिप्त कर्मचारियों को संरक्षण दिया जा सके। बछरावां के कई स्कूलों के शिक्षक शिकायत कर रहे हैं कि उनकी मूल सेवापुस्तिकाएं कार्यालयों से गायब हैं। प्रमुख शिकायतकर्ता शिक्षक- शिक्षिकाओं में नीलम त्रिपाठी (प्राथमिक विद्यालय कुर्री), श्वेता सिंह (प्राथमिक विद्यालय कुशली खेड़ा), दिनेश यादव (प्राथमिक विद्यालय कुर्री), अरुण कुमार (कंपोजिट विद्यालय सब्जी), और विद्या सोनकर (कंपोजिट विद्यालय सरौरा) शामिल हैं। इन शिक्षकों ने बार-बार शिकायतें कीं, लेकिन प्रशासन की ओर से कोई कार्यवाही नहीं हुई। सेवा पुस्तिकाएं किसी भी कर्मचारी के सेवा जीवन का आधार होती हैं, जिनके बिना वेतन निर्धारण, पदोन्नति और पेंशन जैसे अधिकार प्रभावित होते हैं। यह स्थिति स्पष्ट करती है कि शासनादेश संख्या- 785/68-5-2019, शिक्षा अनुभाग-5 दिनाँक 02 सितंबर 2019 और राज्य परियोजना निदेशक कार्यालय- पत्रांक- अधि0अ0नि0बे0बै0/11778/2023-24, दिनांक 21 दिसंबर 2023 के अनुरूप सेवा पुस्तिकाओं को सुरक्षित रखने का पालन नहीं किया जा रहा है।कंपोजिट विद्यालय सरौरा में कार्यरत अनुचर विद्या सोनकर पिछले तीन वर्षों से चयन वेतनमान की प्राप्ति के लिए भटक रही हैं। रेनू सिंह ने आरोप लगाया कि बीईओ कार्यालय बछरावां पिछले छह वर्षों से उनका वेतन बहाली आदेश नही दिया जा रहा है। कमलेश यादव (प्राथमिक विद्यालय बबुरिहा खेड़ा) और अर्चना सिंह (प्राथमिक विद्यालय टांडा) चयन वेतनमान से वंचित किए गए हैं, जबकि उनके बैच के अन्य शिक्षक लाभ प्राप्त कर रहे हैं। यह स्पष्ट संकेत है कि प्रशासनिक तंत्र में पारदर्शिता और समानता की कमी भ्रष्टाचार और भेदभाव को बढ़ावा देती है। अवशेष देयकों का मामला भी अत्यंत गंभीर है। राजीव शुक्ला, सरिता सिंह, विभा सिंह, लक्ष्मी जायसवाल, विनीता उपाध्याय, समता सिंह, रेखा मिश्रा, अर्चना मिश्रा, ज्योति चौरसिया, पूनम, नीतू चौधरी, नेहा मिश्रा, मीनू जायसवाल, दीप्ति अग्निहोत्री, भुवन मोहनी, नीतू सिंह सहित दर्जनों शिक्षक-शिक्षिकाओं ने लंबित अवशेष भुगतान की मांग प्रार्थना पत्रों के माध्यम से की। इन सभी लंबित शिकायतों का अभी तक समाधान न होना प्रशासनिक उदासीनता और भ्रष्टाचार का प्रमाण है। इसके अतिरिक्त करेक्शन आवेदन के बावजूद अधिकांश शिक्षक/शिक्षिकाओं की ई0सर्विष बुक अपडेट न किया जाना भी प्रमुख समस्या रहीं है। इस पूरे घटनाक्रम से स्पष्ट होता है कि "जीरो टॉलरेंस" नीति केवल शब्दों में रह गई है। प्रशासन की उदासीनता और भ्रष्टाचार के प्रति मूक दृष्टिकोण ने इसे जनता के सामने एक दिखावे में बदल दिया है। बछरावां की यह स्थिति शासन की विश्वसनीयता, प्रशासनिक क्षमता और संवेदनशीलता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाती है। अब तत्काल आवश्यकता है कि शासन इस मामले में संज्ञान ले, जांच समिति के माध्यम से निष्पक्ष और पारदर्शी जांच सुनिश्चित करे, दोषियों की जवाबदेही तय करे, लंबित वेतन और अवशेष देयकों का भुगतान प्राथमिकता के आधार पर करे और गायब सेवापुस्तिकाओं की जांच निष्कर्ष तक पहुँचाए। यदि यह नहीं किया गया, तो "जीरो टॉलरेंस" नीति केवल शब्द बनकर रह जाएगी और बछरावां की यह घटनाएं प्रशासनिक भ्रष्टाचार और लापरवाही की सच्ची तस्वीर उजागर करती रहेंगी।