होली पर खुशियां नहीं शोक मनाते हैं यहां के लोग, मनाया जाता है तीन दिन का शोक

होली पर खुशियां नहीं शोक मनाते हैं यहां के लोग, मनाया जाता है तीन दिन का शोक

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रिपोर्ट-ओम द्विवेदी(बाबा)

मो-8573856824

रायबरेली- जब चारों ओर लोग होली के उल्लास में सराबोर रहते हैं तो डलमऊ के दो दर्जन से अधिक गांव के लोग सदियों पूर्व अपने राजा की मौत पर आज भी कहीं तीन दिन तो कहीं एक सप्ताह का मातम मनाते हैं, होली पर शोक मनाने की यह परम्परा डलमऊ की पहचान बन चुकी है।

संगीत, रंग व उमंग आदि होली के प्रमुख अंग हैं। पर्व पर चारों तरफ रंगों की फुहार सी फूट पड़ती है। मगर, डलमऊ में होली पर लोग गम में डूबे रहते हैं, लगभग 1321 ई० पूर्व डलमऊ के राजा डलदेव नए संवत्सर के आगमन का जश्न मना रहे थे। तभी जौनपुर के शाहशर्की की सेना ने डलमऊ के किले पर आक्रमण कर दिया।

आक्रमण की सूचना पाकर राजा डलदेव अपने सैनिकों को दुश्मन की सेना को मुहतोड़ जवाब देने का आदेश देते हुए स्वयं युद्ध करने के लिए दो सौ सिपाहियों के साथ मैदान में कूद पड़े। युद्ध करते समय जौनपुर के शाहशर्की की सेना ने पखरौली गांव के निकट राजा डलदेव को मार दिया।

इस युद्ध में राजा डलदेव के दो सौ व शाहशर्की के दो हजार सैनिक मारे गए थे। सदियां गुजर गईं, बावजूद डलमऊ तहसील के 28 गांवों में तीन दिनों का शोक आज भी मनाया जाता है। होली का त्योहार आते ही आज भी उक्त ऐतिहासिक घटना की याद ताजा हो जाती है।

ऊंचाहार तहसील के इन गांवो में भी रहता है राजा डल का शोक

गोकना, पूरे पृथ्वी, कुशलकापुरवा, पूरे लोधन, खरौली, पूरे निधान, पूरे होरीलाल, पूरे लल्लू पांडेय के साथ ही गदागंज थाना के धईजलालपुर समेत आठ गांवों में भी होली का पर्व के बाद पांच व सात दिनों के अंतराल में मनाई जाती है।