राजकीय पक्षियों का गढ़ कहीं जाने वाली टांडा झील में अब नहीं सुनाई देता राजकीय पक्षियों का कलरव

राजकीय पक्षियों का गढ़ कहीं जाने वाली टांडा झील में अब नहीं सुनाई देता राजकीय पक्षियों का कलरव

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क्षेत्र में सारस की घटती आबादी से वन विभाग एवं पर्यटन विभाग की भूमिका पर उठ रहे है सवाल


रिपोर्ट:- ऋषि मिश्रा
मो०न०:-9935593647


बछरावां रायबरेली। लगभग एक दशक पूर्व राजकीय पक्षी सारस का गढ़ कहीं जाने वाली विकास क्षेत्र के अंतर्गत टांडा गांव में झारखंडेश्वर मंदिर के पीछे स्थित कई बीघे की विशाल झील अब राजकीय पक्षियों के कलरव के शोर से वीरान दिखती हुई नजर आ रही है, क्योंकि उक्त झील में इन राजकीय पक्षियों के संरक्षण के लिए न तो वन विभाग के द्वारा कोई ठोस कदम उठाया गया और न ही पर्यटन विभाग के द्वारा। ग्रामीण शिवाशंकर शुक्ला, डॉक्टर लक्ष्मीकांत, आचार्य हरेराम मिश्र, राकेश कुमार, रामू अनाड़ी, देवराज सिंह, अविनाश चंद्र बाजपेई, मधुकर सिंह, दुर्गेश सिंह, सत्यनारायण कुशवाहा सहित दर्जनों क्षेत्रवासियो का मानना है कि पूर्व में वन विभाग और पर्यटन विभाग के द्वारा अगर इस झील के सौंदर्यीकरण एवं राजकीय पक्षियों के संरक्षण के लिए कोई ठोस कदम उठाया गया होता तो आज इन पक्षियों के कलरव का शोर इस झील के इर्द गिर्द सुनाई दे रहा होता और इस तरह से यह राजकीय पक्षी एकाएक विलुप्त होते हुए नजर नहीं आते। साथ ही साथ उनका यह भी कहना है कि कुछ वर्ष पूर्व कुछ राजकीय पक्षी इस झील के इर्द-गिर्द दिखाई दे रहे थे, परंतु बीते 5 वर्षों से उनकी संख्या न के बराबर दिख रही है। जिसका कारण वन विभाग और पर्यटन विभाग के द्वारा पूर्ण रूप से इस विशालकाय झील को संरक्षित करने की व्यवस्था न करना है। वही वनरक्षक बृजेश कुमार के द्वारा भी इस बात की पुष्टि की गई है कि कभी इस झील के कारण आसपास का मौसम राजकीय पक्षी सारस के लिए अनुकूल होता था, जो कि अब नहीं रह गया है, जिसके कारण क्षेत्र में दिख रहे राजकीय पक्षियों की संख्या में निरंतर कमी आई है। इसी कड़ी में ग्रामीणों कि यह मांग है कि अगर इस विशालकाय झील का संबंधित विभागों के द्वारा संरक्षण व सौंदर्यीकरण करा दिया जाए तो पुनः इस झील के आसपास साइबेरियन एवं राजकीय पक्षियों का जमावड़ा और उनके सुंदर कलरव का शोर सुनाई देने लगेगा, जो की स्थानीय जैव विविधता को बढ़ावा देगा और एक सुंदर वातावरण एवं स्वच्छ पर्यावरण का विहंगम दृश्य प्रस्तुत करेगा। अब देखने वाली बात यह होगी कि संबंधित विभाग उक्त गंभीर समस्या का कब तक समाधान करते हुए नजर आते हैं।